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Showing posts from May, 2021

अफसर बाबू

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नमस्कार, साहब आये तो अफ़सर बाबू दौड़ पड़े ! "अफसर" या ऑफिसर ,साहब, इन सभी शब्दो को सुन कर हमारे दिमाग में एक ऐसे व्यक्त्वि की छवि उभरती है ,जो अनुशासित शालीन हो ,रॉब तो ऐसा की कर्मचारी खौफ से काँपने लगे,तुरन्त फैसले करने वाला ,समय का पाबन्द ओर सबसे पहले एक 'जिम्मेदार इंसान ' ! आपने कभी न कभी किसी अफसर,अधिकारी को देखा तो होगा ओर उसके काम करने के तरीके से , व्यक्त्वि से आकर्षित होने से आप अछूते भी नही रहे होंगे , आजके मन मे भी किसी ऊँचे पद पर काम करने की इच्छा जागी होगी ! हमारे यहां ओर किसी सरकारी अफसर को किसी राजा से कम नही आँका जाता , लाखो युवा इन्हें अपना आदर्श मानते है , इनकी जीवनशैली को अपनाना चाहते है ,लेकिन एक अफसर का जितना बड़ा पद होता है उससे बड़ी होती है उस पद -ओहदे की गरिमा और जिम्मेदारी ओर उतना ही बड़ा उसे पाने का संघर्ष और परिश्रम, खेर ये तो बात हुई एक अफसर ,अधिकारी के प्रति हमारे विचारो की ,  लेकिन हाल के इस कोरोना महामारी के दौर में हमे इनका एक अलग चेहरा देखने को मिला है ,वह जो कहि -कहि पर सच भी है ! अभी कुछ समय पहले एक शादी रुकवाने गए किसी प्रशासनि...

संस्थान: शिक्षण या सौदा

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नमस्कार, आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है ,ऐसे समय मे आपको हर चीज़ के लिए दौड़ना पड़ता है, प्रतियोगिता करनी पड़ती है ,जी हाँ प्रतियोगता या 'कॉम्पिटीशन'  ,पुराना समय तो ये रहा नही जहां आपने पढ़ाई पूरी की ओर आपकी नौकरी लग गयी वो भी "सरकारी नौकरी"   क्यो खो गए ना ! पुराने समय में ?  तो चलते है अपने समय में , आज हर माँ-बाप की यही इच्छा होती है की अपने बच्चे की नौकरी हो ओर अगर सरकारी हो तो सोने पर सुहागा, लाखों सपने होते है माता-पिता ओर बच्चो के ओर इन्हीं सपनो का बाजार सजता है बड़े-बड़े शहरों में कोचिंग सेंटरों के रूप में , जी आपने सही सुना , कोचिंग एक ऐसी जगह जहां प्रवेश ले लेने का मतलब सफलता मिल ही जाएगी ऐसा समझा जाता है या आपके दिमाग मे भर दिया जाता है !   कोचिंग का नाम सुनते ही हमारे दिमाग आती है बड़ी सी बिल्डिंग ,एक लंबा-चौड़ा क्लासरूम  ओर ढेरो छात्र ! जितने तरह की परीक्षाएं उतने तरह के कोचिंग सेंटर , पालको की नज़र में कोचिंग ऐसी जगह है जहां जाकर पढ़ने से उनके के बच्चो का पढाई में प्रदर्शन अच्छा होगा, किसी विषय मे वो कमज़ोर हो तो उसे उस विषय को अच्छे ...

स्टूडेंट

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 सुना है छाबड़ा जी के बेटे का सेलेक्शन हो गया है ? तुम कितने नम्बर् से रह गए? अरुण आई.टी.आई. करलेना, तुम्हारे लिए वही काफी होगा ! अच्छा कमा लोगे , बस तुम्हारी  अंजू ग्रेजुएट हो जाए  , लड़का देखने की जिम्मेदारी मुझ छाबड़ा पर छोड़ दो, लड़किया कितना पड़ लेती है ,ऐसे ही ना जाने कितने छाबड़ा अंकल आपके ओर मेरे घर आकर आपके लिए फिक्र करते है और अपने ख़यालो को आप पर लपेट कर  चल देते है! ऊपर लिखी कुछ बातों से लगा ना आपको भी जुड़ाव , ओर शायद एक अजीब से चिढ़ भी आई होगी और याद आये होंगे कुछ अंकल -आंटी ,ओर न जाने कितने दूर के या पास के रिश्तेदार जिन्हें अपने बच्चो की खबर तो खैर है नही !  बेचारे भोले माँ-बाप तो अपने बच्चो की चिंता में डूब जाते है की बच्चा क्या करेगा? ,कैसे पढ़ेगा? ओर उससे ज्यादा इस बात की चिंता की ये चार लोग क्या कहेंगे/सोचेंगे? अब ये चार लोग कोन है पता नही ? एक तरफ माँ-बाप की चिंता, आशाए ओर अपने बच्चो से प्यार और एक तरफ ये दुनिया और उसमें बसे  लोग ओर रिश्तेदार  , इन सब के बीच घिरा होता है या होती है एक 'स्टूडेंट' ,छात्र बोलो या बच्चा , उसके मन मे क...

कोरोना-आजकल

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कोरोना -आजकल ,2019 के अंत मे चीन से एक वायरस फैलना शुरू हुआ ,धीरे-धीरे ये वायरस एक देश से दूसरे देश मे फैलता गया , ओर शुरू हुआ मौत ,बेरोजगारी,ओर बेबसी का खेल ! न जाने कितने लोगों के सहारे छीन गए , कितने बच्चे ,कितने बुज़ुर्ग बेसहारा हो गए! वो साल जब ना हमारे  पास  वेक्सीन थी , ना  कोई सटीक दवा , था तो बस हमारे पास हमारी आस ओर विश्वास ,डरते -सिसकते, घुटते हुए हम लड़ ही तो रहे थे उस मंजर से ! हाइड्रोक्सीस्क्लोरोक्विन से लेकर रेमदेसीवीर बोलना सीखने तक के इस फासले ने बहुत कुछ सीखा दिया हमे परिस्थितियों ने ! कई जगह मदद के हाथ बढ़े , तो कहि बेबसी ने तोड़ कर रख दिया , सवा दो साल के सी कोरोनाकाल में हमने क्या कुछ नही देखा,  हज़ारो किलोमीटर सुखी रोटी को पानी से हलक से उतारती हुई गीली आँखों से लेकर मदद की गुहार लगाती बिलखती चीत्कारों तक , फिर भी जीने की आस ओर जिदंगी की एक एक सास के लिए लोग दांव लगाते रहे ! धीरे धीरे वेक्सीन कि खोज शुरू हुई , ओर पूरी भी हुई , लेकीन क्या सवा सो करोड़ की आबादी वाले देश को पूरी तरह टीकाकृत करना इतना आसान था , जो सरकार एक साल तक नींद में रही ...