अफसर बाबू

नमस्कार, साहब आये तो अफ़सर बाबू दौड़ पड़े ! "अफसर" या ऑफिसर ,साहब, इन सभी शब्दो को सुन कर हमारे दिमाग में एक ऐसे व्यक्त्वि की छवि उभरती है ,जो अनुशासित शालीन हो ,रॉब तो ऐसा की कर्मचारी खौफ से काँपने लगे,तुरन्त फैसले करने वाला ,समय का पाबन्द ओर सबसे पहले एक 'जिम्मेदार इंसान ' !

आपने कभी न कभी किसी अफसर,अधिकारी को देखा तो होगा ओर उसके काम करने के तरीके से , व्यक्त्वि से आकर्षित होने से आप अछूते भी नही रहे होंगे , आजके मन मे भी किसी ऊँचे पद पर काम करने की इच्छा जागी होगी ! हमारे यहां ओर किसी सरकारी अफसर को किसी राजा से कम नही आँका जाता , लाखो युवा इन्हें अपना आदर्श मानते है , इनकी जीवनशैली को अपनाना चाहते है ,लेकिन एक अफसर का जितना बड़ा पद होता है उससे बड़ी होती है उस पद -ओहदे की गरिमा और जिम्मेदारी ओर उतना ही बड़ा उसे पाने का संघर्ष और परिश्रम, खेर ये तो बात हुई एक अफसर ,अधिकारी के प्रति हमारे विचारो की ,  लेकिन हाल के इस कोरोना महामारी के दौर में हमे इनका एक अलग चेहरा देखने को मिला है ,वह जो कहि -कहि पर सच भी है !
अभी कुछ समय पहले एक शादी रुकवाने गए किसी प्रशासनिक अफसर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल (फैलना) हुआ जिसमे शादी में आये मौजूद लोगों से महोदय अभद्रता कर रहे है , बद्तमीजी ओर ताकत के रॉब का आलम तो ये था कि इन्होंने न तो महिलाओ को छोड़ा न उम्र में बड़े पण्डित को ,ओर ना ही अनुमति के कागज़ देखना जरूरी समझा , वीडियो फैलने के कारण नतीज़तन महोदय को निलंबित कर दिया गया !
ठीक ऐसे ही छत्तीसगढ़ में एक राह चलते युवा के साथ एक अफसर द्वारा उसे तमाचा मारने की बात एक वीडियो में आई , तमाचा मारने के साथ उस युवक का फोन भी तोड़ दिया !
उक्त  दोनों मामलो से विचार आते है कि क्या किसी अफसर का ऐसा अभद्र ओर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कही से भी ठीक था ? क्या लोगो को कोरोना की गाइडलाइन के नियमो का पालन करना सिखाते हुए ये भूल गए कि दूसरों के चेहरे तो क्या खुदके चेहरे पर भी हाथ नही लगाना है और जोश में थप्पड़ जड़ दिया? , माना कि कई लोग लापरवाही कर रहे है,उन्हें समझाने के लिए सख्ती ज़रूरी भी है लेकिन इसमें उन लोगो की क्या गलती जो किसी मजबूरी से ज़रूरी काम से बाहर निकले हो?  इस तरह के गलत व्यवहार ओर संवेदनहीन व्यवहार से तो उन तमाम अफसरों और अधिकारियों  की साख ओर छवि पर सवाल उठना स्वभाविक है !
 
प्रशासनिक अधिकारियों ,अफसरों से एक कदम आगे  तो पुलिस और निगमकर्मी , नगरनिगम और मंडियों के अधिकारी है जिनके कारनामे  तो आये दिन देखने ओर सुनने को मिलते है सिर्फ एक शहर में नही बल्कि सभी शहरों में , कोरोना तो केवल एक दौर है ओर इनके क्रिया-कलाप तो हर समय आम है ,ओर इस तथ्य को कोई नकार भी नही सकता ! इंदौर में  डायलिसिस (किडनी रोग में खून को साफ कराना) के लिए जाते हुए व्यक्ति को रोक देना ,लाख मनाने- समझाने के बाद भी पुलिस कर्मी उस व्यक्ति से कहता है कि घर पर करवालो , उसके जवाब में व्यक्ति कहता है कि मशीन घर पर लगवादो , पुलिसकर्मी पढ़े लिखे तो होते ही है तो क्या उन्हें ये ठीक नही लगा कि जाने दे , एक वाकये में  गाड़ी से कुछ फूल लेकर जा रहा था ,पूछने पर उसने बताया की आर्डर के फूल है ,घर मे बच्चे भूखे है ,मुझे जाने दो ,उसने मिन्नते की , हाँ उसकी लापरवाही थी , ज़िद करने पर उसे पुलिसकर्मियों ने उसे बस में इस धक्का दे मारा की उसका सर फट गया , अब उसे समझाया भी तो जा सकता था , चोट देने की क्या ज़रूरत थी वो भी सिर पर? जितनी  तरुणाई -जोश से उस व्यक्ति को चोट पहुँचाई (न जाने कितनों को) उतने ही जोश से अगर ये अपराधी को पकड़े तो शायद गुनाह कम हो ,जोश के नाम पर किसी को चोट पहुँचाना ओर बड़े अधिकारी के आने पर तीतर-बितर हो जाना क्या सही है ? ठीक इसी इसी तरह पीली गाड़ी वाले निगमकर्मी ओर अधिकारी जो अपने आप को शायद राजा समझने है , मंडियों में अपनी पूंजी लगा कर ये कुछ सब्जी -फल सामान खरीदते है इस आशा में की आज तो इनके परिवार-बच्चो की रोटी, दवाओं का कुछ  इंतेजाम हो जाये लेकिन उसमें भी मंडियों में पहले दरोगा को कुछ चढ़ावा देना पड़ता है, पीली गाड़ियों वाले बाज़ार में ऐ चिप्स, ऐ नारियल फोड़ू क्या? जैसी भाषा से अपमान करके बुलाते है और बन्दी  (रिश्वत)  देने पर ही इन्हें समान बेचने देते है ,पूछने पर बताते है कि निगमवाले परेशान करते है ,मुफ्त में सामान लेते है ,लागत तो निकलती नही है ओर इन्हें पैसे देने पड़ते है , क्या इनके ऐसे कारनामो से ये लोग उन मांगने वालो से भी बद्तर है जो लाचार होते है? सच मे इनके इस तरह गरीब ओर मेहनती जनता से पैसे ऐठने से तो यही लगता है कि ये सरकार से तनख्वाह लेने के बावजूद बेशर्म होकर जनता से भीख मांगते है ,उन्हें लूटते ,ऐसी भिक्षावृत्ति (भीख मांगने की आदत ) इन्हें शोभा देती है?यह सब जानने पर भी जिम्मेदार मूकदर्शक बन कर बस तमाशा देखते है , ऐसे लोग जिनका सरकार से तन्ख्वाह लेकर भी पेट नही भरता वो ये याद रखे कि रिश्वत के पेसो के साथ सामने वाले कि मजबूरी भरी हजारो बद्दुआएं भी वो लेते है , न केवल सरकारी विभागो के अधिकारीयो ,कर्मचारीयो बल्कि ,प्राइवेट(निजी) क्षेत्रो कर लोग को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए, अगर आपको रोटी मिल रही है तो इसका मतलब ये नही की आओ दुसरो का निवाला छीने !
जिम्मेदारों ने केवल नियम कायदे थोपे लेकीन ये नही सोचा को जो सक्षम नही है ,रोज कमाते -रोज खाते है उनकी मुश्किलो को कम करे ,उनके लिए कुछ व्यवस्था करे जिससे उन्हें नियम तोड़ने पर मजबूर न होना पड़े ,ओर  गलती तो रिश्वत देने वालो की भी है लेकिन क्या वो मजबूर नही है !
कुछ विचार मन मे आते है कि क्या कोई युवा इसी ताकत के रॉब के लिए कठिन परिश्रम करता है , क्या सेवा भाव छोड़ कर ऊँचे वेतन ओर रॉब जमाने के लिए लोक सेवा में जाता है?उन्हें ये याद होना चाहिए कि वो आज जो भी है ,जिस मुकाम पर है वो उनके माँ-बाप की वजह है जो कि इसी जनता का हिस्सा थे , 
ऐसे कठिन समय मे प्रशासन, प्रशासनिक अधिकारी , ओर अन्य विभाग सभी एक प्रकार से तनाव में है ,वो भी इंसान है लेकिन  उन्हें चाहिए कि वो अपनी सूझ-बूझ, ओर संवेदना का परिचय दे , लोगो को शांति और विनम्रता से समझकर ,उन्हें समझाकर, ऐसा न कर के वह विभाग के उन साथियो के प्रयासों को बेकार कर रहे है ओर उनकी ओर अपनी छवि को खराब करने की राह पर चल पड़ेगे ! चाहे कितना भी बड़ा व्यक्ति हो ,अधिकारी हो , कोई शिक्षक , सभी का पहला गुण सहजता और विनम्रता होता है, याद रखिये जो बनावटी है उसे भुला दिया जाता है लेकिन जो सहज और सरल है उसे हमेशा याद रखा जाता है और उसका दिल से सम्मान होता है ,बात यहां आलोचना की नही , पीड़ितों की वेदना -दर्द समझने की है , प्रशासन से यही निवेदन है की आप जनता की परेशानियों को हल करेंगे  तो जनता सहर्ष  नियमो का पालन करेगी ।
                                             जय हिंद , जय भारत
                                              

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