कोरोना-आजकल

कोरोना -आजकल ,2019 के अंत मे चीन से एक वायरस फैलना शुरू हुआ ,धीरे-धीरे ये वायरस एक देश से दूसरे देश मे फैलता गया , ओर शुरू हुआ मौत ,बेरोजगारी,ओर बेबसी का खेल ! न जाने कितने लोगों के सहारे छीन गए , कितने बच्चे ,कितने बुज़ुर्ग बेसहारा हो गए! वो साल जब ना हमारे  पास  वेक्सीन थी , ना  कोई सटीक दवा , था तो बस हमारे पास हमारी आस ओर विश्वास ,डरते -सिसकते, घुटते हुए हम लड़ ही तो रहे थे उस मंजर से ! हाइड्रोक्सीस्क्लोरोक्विन से लेकर रेमदेसीवीर बोलना सीखने तक के इस फासले ने बहुत कुछ सीखा दिया हमे परिस्थितियों ने ! कई जगह मदद के हाथ बढ़े , तो कहि बेबसी ने तोड़ कर रख दिया , सवा दो साल के सी कोरोनाकाल में हमने क्या कुछ नही देखा,  हज़ारो किलोमीटर सुखी रोटी को पानी से हलक से उतारती हुई गीली आँखों से लेकर मदद की गुहार लगाती बिलखती चीत्कारों तक , फिर भी जीने की आस ओर जिदंगी की एक एक सास के लिए लोग दांव लगाते रहे !



धीरे धीरे वेक्सीन कि खोज शुरू हुई , ओर पूरी भी हुई , लेकीन क्या सवा सो करोड़ की आबादी वाले देश को पूरी तरह टीकाकृत करना इतना आसान था , जो सरकार एक साल तक नींद में रही , ओर आज इस दूसरी लहर ने हमे ओर मजबूर कर दिया,  लोग एक एक सास के लिए तड़पते रहे लेकिन फिर भी आकाओं की नींद ना टूटी ,केवल आत्म-मुग्धता का चोला ओढ़े खामोश बैठे रहे , आत्मनिर्भर भारत का सपना दिखा कर देश को  ओरो पर निर्भर कर दिया ,  ऐसा सत्ता मोह - सत्ता लोभ  भी क्या जो लोगो की जान पर बन आये , बंगाल ,उत्तरप्रदेश, बिहार तो इसकी बानगी है , तो आप सोच ही सकते है , क्या चिंता हो सकती है इन्हें आपकी? 'अभिजात्य वर्ग' सम्पन्न लोगों में से कुछ अम्बानी , रतन टाटा जैसे लोगो ने मदद का हाथ बढा कर अपना सामाजिक फ़र्ज़ निभाया लेकिन क्या ये फ़र्ज़ उन लोगो का नही जो युवा नेता बने टँगे फिरते है गली -चौराहो पर, क्या सारी सेवा की जिम्मेदारी  केवल सोनू सूद को ही दी गयी है!  
यदि सभी सांसद , विधायक , मंत्री अपनी निधियों से भी कुछ पैसा निकाल कर दे तो भी इतनी राशि इकट्ठी हो जाएगी की लोगो की मदद की जा सके ,बड़े पैमाने पर वेक्सीन लगाने की घोषणा की गई लेकिन आज की हालत देख कर तो यही लग रहा है कि ये बात भी बोगस निकली,  जब भारत मे दस  कंपनिया वेक्सीन पर काम  कर रही है तो उन्हें  वेक्सीन बनाने की अनुमति क्यों नही दी गयी? यदि कंपनिया वेक्सीन बंनाने में सक्षम नही है तो जो कंपनी (सीरम इंस्टीट्यूट) इसे बना रही है उसके मार्गदर्शन  में अन्य कंपनियों को काम क्यों नही दिया जा रहा है , सोचने वाली बात की यदि देशी की आधी आबादी यानी 51 करोड़ लोगों को भी यदि वेक्सीन लगा दिया जाए तो महामारी पर काबू पाया जा सकता है , जिसकी लागत सूत्रों अनुसार 40,000 करोड़ है ,जिसे 200 लाख करोड़ की सालाना आय वाला देश वहन कर ही सकता है!

ऑक्सीजन , वेंटिलेटर , सिलिंडर की कमी को देखते हुए  डॉक्टरो का कहना है कि डिमांड बढ़ी है  तो क्या ज़िम्मेदारो को ये होश नही था कि आने वाली दूसरी लहर के लिए तैयारी नही की जा सके ,  आखिर दोष कीन्हे दे , दोष हम जनता का भी है जब संक्रमण का असर कम होने लगा और हम लापरवाह हो गए और अब भी सम्भलने की नही सोच रहे है , वक्त है अभी भी हम हमारी सूझ -बूझ से इस महामारी से बच कर सम्भल सकते है।
                                              जय हिंद ,जय भारत
                                               विनय मरमट

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