माँ-बाप की आस बेटा हु मैं
बचपन मे मैंने किताबें फाड़ी,
तो पिता ने मुझे पेड़ पर लटकाया।
मेरे चरित्र निर्माण के लिये,
माँ ने अपना फर्ज बखूबी निभाया।
इनके कारण ही तो अस्तित्व में हु मैं,
माँ-बाप की आस,बेटा हु मैं।
बच्चे पढ़ लिख के साहब बने,
इन्होंने अपना गांव ,घर- आंगन छोड़ा।
दिन और रात की मेहनत एक करके,
बच्चों के सपनों को स्कूल से जोड़ा।
इनके लिये ही तो सबसे मजबूत हूं मैं,
माँ-बाप की आस,बेटा हु मैं।
खुद से पहले हमारे बारे में सोचा है,
हर चीज़ के लिये पहले हमें ही दिया मौका है।
कपड़ों की बाजार हो या मिठाई की दुकान,
इनकी पहली प्राथमिकता तो है हमारी मुस्कान,
इनके त्याग को देखकर हैरान हूं मैं,
माँ-बाप की आस बेटा हु मैं।
घर पर कितनी भी मुसीबत भले हो,
अपने सामने हमेशा इनको पाया है।
पिता ने मेरी काबिलियत को निखारा,
तो माँ ने भी कलाकारी को सराहा है।
इनका तो सबसे बडा कलाकार हु मैं,
माँ-बाप की आस,बेटा हु मैं।
बहुत किया इन्होंने अब बारी मेरी है,
इनके स्वाभिमान की अब जिम्मेदारी मेरी है,
मैं न तो कभी थकूंगा न तो कभी रुकूँगा,
हमेशा अपने कर्तव्य पथ पर डटा रहूंगा ।
इनके लिये कुछ भी करने को तैयार हूं मैं,
माँ-बाप की आस,बेटा हु मैं।
Writer Yogendra Kushwaha
Bohot badhiya kushwah ji ��������
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