पत्रकारिता :लोकप्रियता या अभिशाप Journalism: Fame or Death
नमस्कार, इन दिनो लॉक डाउन में हम में से ज्यादातर लोग घर मे है ,लेकिन अब घर मे हम है तो दीन-दुनिया से कैसे जुड़े होंगे? कैसे पता लगता होगा कि दुनिया मे , हमारे आस-पास क्या घट रहा है ? इन सवालों को एक जवाब है , मीडिया , पत्रकारिता ओर उसे करने वाला पत्रकार जी हां, पत्रकार , ऐसे कठिन समय मे भी अपने घर-परिवार से दूर रहकर अपनी जान की फिक्र किये बिना जो हमें देश ओरे दुनिया से जोड़े रखे है वह है पत्रकार , पिछले आर्टिकल में हमने मीडीया , पत्रकारों की खामियों की बात की , लेकिन ये तब तक जायज़ , नही जब तक की हम उनके महत्व को न जाने और उनकी खूबियों को ना सराहे , हर सिक्के के दो पहलू होते है एक खूबियों का तो एक खामियों का! लेकिन क्या केवल किसी की सराहना करने मात्र से ही पूर्ति हो जाती है , सराहना के साथ -साथ सुरक्षा का भी उतना ही महत्व है!
एक मुखर आवाज़ का बुलन्द होना जो बिना किसी की जी -हुजूरी , या स्वामिभक्ति किये बिना जनता के सामने सच को बयां करे कि क्या सही है और क्या गलत ?, यह है एक असल पत्रकार की पहचान , जो कि इस समय में दुर्लभ है ,लेकिन आज भी ऐसे "बिरले" पत्रकार है जो कि अपने काम को बखूबी अंजाम देना जानते है , लेकिन शायद "बनाये गए स्वामीभक्तो या गुलामो" को सच्चाई बाहर आना गवारा नही , जो कि बिना कुछ सोचे धमकी , बलात्कार ओर हत्या जैसे कामो को करने में जरा भी नही हिचकते!
बीते दिनों 'उत्तर प्रदेश' के 'नोएडा' में एक पत्रकार की उसी की बच्चियों के सामने सरेआम हत्या करदी जाती है , ओर उसकी बेटियाँ चिल्लाती रह जाती है , ओर ये सारा वाकया जनता "तमाशबीन" बन कर देखती रहती है , कोई एक हाथ भी मदद या बचाव के लिए नही बढ़ता , क्या हम सभी इतने विस्मित या सन्न हो गए है कोई आकर गलत काम कर भी जाए लेकिन हम उसे रोक भी ना पाए, अपराध की दुनिया मे " उत्तर प्रदेश" एक उभरता हुआ राज्य बन चुका है जहां आकाओ की नाक के नीचे से अपराधी बिना किसी डर के कारनामे किये जा रहे है , शायद अब इस राज्य को " अपराधभूमि" कहना गलत नही है , ना केवल 'उत्तर प्रदेश' बलिक समूचे देश मे ही पत्रकारो को धमकाने से लेकर उनकी हत्या करने का एक चलन सा ही हो गया है , 'दक्षिण ' में 'पत्रिके' पत्रिका की लेखिका "गोरी लंकेश" की हत्या भी इसी का जीता जागता उदाहरण है , एक मुखर पत्रकार जो कि जनता के सामने सच्चाई लाने का जी -तोड़ प्रयास करता है क्या उसे उसके काम का ऐसा इनाम देने जायज़ है? और अगर वह किसी के बारे में कुछ कड़वा लिखता भी है तो वो यह दिखाने के लिए की क्या सही है , क्या गलत है , ताकि जनता गुमराह ना हो , लेकिन "अंदभक्तो" को तो केवल भेड़ चाल चलने के अलावा कुछ दिखता ही नही , हम यहां किसी गलत लिखने वाले कि वकालत नही कर रहे , लेकिन जो सही मायनों में अपने पत्रकारिता धर्म का बिना किसी डर के पालन कफ रहे है, केवल जनता को जागरूक बनाने के लिये, क्या उन पत्रकारो , रिपोर्टरो के लिए भय, धमकियो, ब्लात्कार से लेकर हत्या का माहौल सही है ?
पत्रकारों की हालत के बारे में रोज नए-नए किस्से तो हम पढ़कर जान ही लेते है या चटकारे ले लेते है, लॉक-डाउन के दौरान ही इंदौर के एक प्रतिष्ठित अखबार के रिपोर्टर के साथ बुरा व्यवहार किया गया था जो केवल' कंटैंन मेन्ट' जोन की खबर जानने के लिए वहां गया था, इस जीते-जागते उदाहरण से तो आप स्थिति केसी है जान सकते है! इसमे भी महिला पत्रकारों के साथ तो ओर परेशानी का सबब है , तरह तरह के माहौल में जाना , दिन-रात एक करके रिपोर्टिंग करना साथ ही घर परिवार का ख्याल ओर चिंता मुफ्त, तरह तरह की फब्तियां सुनके अनसुना करके सिर्फ काम पर ध्यान देना , इस तरह के कई काम एक महिला पत्रकार को करना पड़ते है , ओर यह तो शायद इस ' कृतज्ञहीन' समाज का आम स्वभाव ही बन गया है, 'भारत 'जैसे महान देश जहां स्त्री को देवी समान मान कर सम्मान दिया जाता है , वही पर एक महिला पत्रकार की हत्या होने पर "मर गयी###@%$" जैसे नीचे शब्दो का प्रयोग कर केवल कुछ कतिपय अंध भक्तो द्वारा "ओछी" मानसिकता दर्शायी जाती है , जोकि न केवल उससे जुड़े पूरे संगठन अपने साथ खीच लेता है , "इटली की जर्सी गाय" जैसे न जाने कई शब्द तो जाने मानी हस्तियों तक के बयानों में दर्ज है , क्या यह न्यायसंगत है कि कुछ नाम मात्र के पत्रकारों ( जिनका कोई भरोसा नही ) के कारण सच्चे ओर सही पत्रकारों को मारा जाए? यह तो वही बात हुई कि " हमे आईने ने सच दिखाना चाहा , ओर हम उसे ही तोड़ कर घायल हो बैठे", किसी , समाज संगठन का हिस्सा रहते हुए उसमे हो रहे गलत को दर्शाना गलत है?
पिछले कुछ सालो में कई पत्रकारो की हत्याएं हुई, जिनमे से कुछ मामले उजागर हुए ओर कुछ दबा दिए गए, यहां हम आपको बीते समय के कुछ चर्चित मामलो से रुबरु करवाना चाहते है , जिससे स्थिति कैसी है इसका अंदाज़ा आपको लग ही जाएगा!
01) साल 2002 में 24 अक्टूबर को पत्रकार "रामचन्द्र छत्रपति " पर उनके घर के बाहर 02 हमलावरों द्वारा गोली चलाई गई और 21 नवम्बर को घावों के कारण उनकी मौत हुई थी!
कारण- 'डेरा सच्चा सौदा' के गुरमीत राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाने के कारण ,
स्थिति- कोर्ट में सारे सबूत पेश किए जा चुके है ओर केस अब तक चल रहा है
02) 20 अगस्त 2013 में पुणे शहर में सड़क किनारे चले हुए पत्रकार "डॉ. नरेंद्र दाभोलकर" की गोली मारकर हत्या करदी गयी!
कारण- अंधविश्वास के बारे में लिखने पर!
स्थिति- सारी सी.बी.आई. जाँच ठंडे बस्ते में चली गईं!
03) 16 फरवरी 2015 को अपनी पत्नी के साथ घर के बाहर टहल रहे पत्रकार "गोविंद पनसारे" की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी!
कारण- अंधविश्वास के खिलाफ ओर अन्य गतिविधियों के बारे में लिखने के कारण!
स्थिति - जांच अभी तक चल रही है!
04) प्रख्यात स्कोलर ओर विचारक "एम .एम. कलबुर्गी" की 30 अगस्त 2015 में उनके बंगलुरु स्थित घर मे हत्या कर दी गयी थी!
कारण- कुछ दलों से जान का खतरा होना,
स्थिति- अभी तक औपचारिक रूप से किसी की गिरफ्तारी नही हो पाई है!
05) 05 सितम्बर 2015 में दो बाइक सवारों द्वारा अपनी कार से निकलती हुई " गोरी लंकेश" की सात गोलिया मारकर हत्या कर दी गयी थी!
कारण- अपनी पत्रिका में आपत्ति पैदा करने वाले लेख लिखने के कारण!
स्थिति- पत्रकार के भाई द्वारा "सी.बी.आई." जाँच की मांग की जा रही है!
इस से आप सभी की मन मे यह विचार जरूर आया होगा कि इसमे हम क्या कर सकते है? जो करना है प्रशासन करेगा , लेकिन प्रशासन तो आँखे मुंदे अपराध होने देने को लाचार है , ऐसे हम आम जनो की यह जिम्मेदारी है कि हम ना केवल पत्रकारो के प्रति अपराध बल्कि सभी ईमानदार लोगो के खिलाफ होने वाले गलत कामो , अपराधो के खिलाफ आवाज उठाये, डट कर नाकि 'डर' कर ।
जय हिंद,
जय भारत
Author -Vinay Marmat
Chief editor -Avni verma
बहुत ही स्पष्ट तरीके से आपने समझाया है👌
ReplyDeleteDhanyawad govind ji
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