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Showing posts from May, 2020

असल आपदा

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नमस्कार, कैसे है आप सभी? आशा है आप सभी कुशल मंगल होंगे,होना भी चाहिए ,ईश्वर से यही कामना है! आज बात शुरु   होती है एक 'कहानी' से  एक बार समुद्र किनारे बसे किसी नगर में एक भीषण तूफान आता है ओर सब तबाह करके चला जाता है ,जैसे कोई भ्रष्ट रिश्वत खाता है और बिना कुछ डकारे चला जाता है उपरोक्त कहानी से यह बात तो समझ आ रही है कि इशारा किस ओर है ! ' बंगाल'  बंगाली मदुभाषियो की भूमि जहां जितना रस  वहां की स्वादिष्ट मिठाइयों  में है उससे ज्यादा रस वहां के लोगो के प्रेम और संस्कृति में है लेकिन उस "भद्रलोक" (भद्र पुरुषों की भूमि) में आज चौतरफा एक तूफान मचा हुआ है ,तूफान मचा  है राजनीति का , गरीबो की पीड़ाओं का,ओर ना जाने क्या क्या, यह कम था जो कोरोना महामारी से जनसामान्य की परेशानी और बढ़ गयी! और रही सही कसर हालही में आये वास्तविक तूफान "अम्फान " ने पूरी करदी न केवल बंगाल ,ओडिशा ,ओर अन्य राज्य भी इस तूफान के प्रकोप को झेल रहे है, तूफान आता है ,ओर विनाशलीला करके चला जाता है ,रह जाता है तो बस गरीब का बिखरा समान ओर उसकी अपने परिवार के गुज़र-बसर करने के लिए कुछ जुटाने क...

परिवर्तन की आवश्यकता

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आज केवल हम , हमारा प्रदेश , देश ही नही बल्कि पूरा विश्व एक भीषण महामारी से लड़ रहा है , जिसकी शुरुआत चीन के वुहान से मानी गयी है ( यह कहना सही भी है कि इसका जनक वही है !!) आप ही सोचिए एक देश जहा से एक बीमारी शुरू होती हौ जिसके बारे में वैज्ञानिकों द्वारा कई बार आगाह किया गया लेकिन समय पर कोई निर्णय नहीं लिया गया , नही कोई सावधानी बरति गयी जिसका निष्कर्ष आज इतने भीषण रूप में निकल कर आया है ! ज्यादा दूर भी क्यों जाना हमारे देश के वीर सेनिको , कर्मचारियों , डॉक्टरो ओर सबसे ज्यादा गरीबो , श्रमिको की पीड़ा ही तो बढ़ी है ! शासन , प्रशासन के अथक प्रयास भी इन श्रमविरो , कोरोना वीरों की पीड़ा के आगे भी यह सब बोना ही नजर आ रहा है ! क्या केवल मुआवजे से , या सांत्वना से किसी मजदूर के परिवार की क्षति पूरी करना सम्भव है ? इसका जवाब है ' नहीं ' जिन श्रमिको को , लघु व्यापारियों ( सब्जी , फल , अनाज , घरेलू सामाग्री ) की महत्ता अब सभी को समझ आगयी है , इनका एक अपना स्वाभिनमान है जिसे ये मजबूरी की अंत सीमा तक डिगने नही देते परन्तु आज ये विवश है बच्चो की भूख के आगे , अपने बुजुर्गों के...

मजदूर क्यों मजबूर?

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आज में ना जाने क्यूं विचलित हूँ , विगलित हूँ ! आज ना मुझे किसी ना डाँटा , ना किसी ने मुझे कुछ कहा फिर भी मन में आज एक अलग से पीड़ा ओर बेचेनी है , वो भी अपनो के साथ होकर भी में उनके साथ नही हूँ ! क्यों ? मन को टटोला , तो समझ  पाई कि शायद इस दुख का कारण है उन मजबूरों की पीड़ा और लाचारी जो कि एक समय में मजदूर श्रमिक कहलाते थे , उन मजदूरों को मजबूत से मज़बूर बनाया गया है , जो दूसरों की सुख सुविधा के लिए अपना खून पसीना एक करदेते थे चाहे कड़ी धूप हो या हाड़ कंपा देने वाली ठंड हो , फिर क्यों आज उन्हें पीड़ित होकर पलायन को मजबूर होना पड़ा , जिस शहर की चकाचौंध में वो भी तो अपने बच्चे के सुनहरे भविष्य की आशा का दिया लिए चल आये थे पर शहर के तथाकथित ' बड़े लोगो '' ( जो कि असलियत में मानसिक रूप व मानवीय रूप से  बोने है ?) ने उनकी स्वयं की रोटी छीन कर उन्हें भगा दिया , अरे जब रोटी नही दे सकते तो छिनने ओर दुत्कारने का हक किसने दिया ? और रही सही कसर इन श्रमवीर ओर छात्रों के साथ उनके मकान मालिकों ने किराया मांग कर , भगा कर पूरी करदी , सोचने को मजबूर करती है ये बाते की क्या इन ' बड़...